प्रधानमंत्री मोदी की बिहार यात्रा के बाद नीतीश कुमार खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं, जबकि भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री पद का वादा नहीं दे रही। दूसरी ओर, विपक्षी INDIA गठबंधन भी आपसी तालमेल के अभाव में कमजोर दिख रहा है। शरद पवार का रुख भी एनडीए के करीब जाता नजर आ रहा है। उधर दिल्ली में आम आदमी पार्टी विरोध की भूमिका में नाकाम रही है। सत्ता और विपक्ष दोनों ही असमंजस और अंतर्विरोधों के दौर से गुजर रहे हैं।

निराश नीतीश

दो दिन के प्रधानमंत्री के बिहार दौरे ने नीतीश कुमार को निराश कर दिया। बड़ी उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में ऐलान कर देंगे कि गठबंधन के अगले मुख्यमंत्री नीतीश ही होंगे। पर इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने कोई चर्चा की ही नहीं। नीतीश ने उनके स्वागत में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी। खुद नारे लगाए और बिक्रम गंज की चुनावी रैली में मौजूद लोगों से कहा कि इनका अभिनंदन करिए। सब खड़े होकर इनको प्रणाम करिए। खड़े हो जाइए। तालियां बजाइये। पर प्रधानमंत्री ने फिर भी उनके नाम का ऐलान नहीं किया। इतना ही नहीं पटना में अपने रोड शो से भी मुख्यमंत्री को दूर रखा। जबकि राजस्थान और गुजरात में रोड शो किए तो दोनों जगह मुख्यमंत्री उनके साथ थे। उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा के बेटे की सगाई के कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री नीतीश को साथ नहीं ले गए।

भाजपा ने तो एक तरह से नीतीश पर अहसान ही किया है कि अपने से आधे विधायक होने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री बना रखा है। नीतीश की बेचैनी बढ़नी स्वाभाविक है। भाजपा इस बार विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीटों की उनकी मांग पूरी नहीं करेगी। बराबर सीटें भी नहीं देगी। आखिर चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियों को भी तो गठबंधन में कुछ सीटें देनी ही होंगी। चुनाव नतीजे ही तय करेंगे कि अगली बार गठबंधन की जीत के बावजूद नीतीश मुख्यमंत्री बन पाएंगे या नहीं।

सिन्हा पर नजर

भाजपा के पार्टी अध्यक्ष के तौर पर जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल तो 2023 में ही पूरा हो गया था। लोकसभा चुनाव में बहुमत मिल जाता तो पार्टी को नया अध्यक्ष तभी मिल जाता। अब नया अध्यक्ष आरएसएस की मंजूरी से ही बन पाएगा। नड्डा अब तक तीन साल की जगह साढ़े पांच साल से पार्टी की कमान संभाल रहे हैं। चर्चा है कि इस महीने उनकी जगह नए अध्यक्ष के नाम का ऐलान होने के पूरे आसार हैं। यह बात अलग है कि संगठन चुनाव की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हो पाई है।

सुनने में आया है कि नए अध्यक्ष के तौर पर मनोज सिन्हा संघ और मोदी-शाह दोनों की पसंद हो सकते हैं। सिन्हा अभी जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल हैं। पांच साल का उनका कार्यकाल अगस्त में पूरा होने के मद्देनजर उनके अध्यक्ष बनने की संभावना को कोई नकार नहीं रहा है। वे भाजपा के शीर्ष और संघ दोनों के पसंदीदा बताए जा रहे हैं।

एक-दूसरे से दूर होता गठबंधन

पहलगाम हमले के बाद से ही विपक्ष संसद सत्र बुलाने की मांग कर रहा है। हाल ही में दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक हुई। इस बैठक में विपक्षी गठबंधन के मुख्य दल को सबसे आखिरी में जानकारी मिली। बैठक की पहल भी पश्चिम बंगाल से हुई थी। सूत्र बताते हैं कि जिन-जिन नेताओं को इस बैठक की जानकारी थी, वे दिल्ली से बाहर थे और बाकी नेताओं तक सूचना ही समय पर नहीं पहुंच पाई।

वहीं अब तक इस गठबंधन का बड़ा हिस्सा रहे आम आदमी पार्टी ने भी संयुक्त सिफारिश के पत्र से खुद को दूर ही रखा और गठबंधन के सहयोगियों के साथ सत्र की सिफारिश खुद अपने ही बलबूते की। यह इस बात का संकेत है विपक्षी गठबंधन अभी मतभेदों में उलझा एकता से दूर है।

विलय की बेला?

शरद पवार की राकांपा के विपक्षी गठबंधन से अलग राह पर चलने के संकेत मिल रहे हैं। 16 विपक्षी दलों ने पहलगाम मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा, उस पर शरद पवार की पार्टी के किसी नेता के हस्ताक्षर न होना इसकी पुष्टि करता है। इससे पहले पवार की बेटी सुप्रिया सुले कह चुकी हैं कि वे पहलगाम मुद्दे पर विशेष सत्र बुलाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।

मानसून सत्र के दौरान ही सरकार से सवाल पूछ लेंगे। मानसून सत्र की घोषणा सरकार ने पहले ही कर दी है। जो 23 जुलाई से शुरू होगा और 12 अगस्त तक चलेगा। शरद पवार लगातार अपने भतीजे अजित पवार के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिख रहे हैं। वे कह चुके हैं कि अजित पवार और उनकी पार्टी का विलय संभव है। दरअसल पवार तो ऐसा पहले ही कर लेते पर बेटी सुप्रिया सुले तैयार नहीं थी।

अब उन्हें भी 11 साल सत्ता से बाहर रहना अखर रहा है। सो एनडीए में आ सकती हैं। विलय का विरोध तो अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार भी कर रही हैं। जिन्हें सुप्रिया ने लोकसभा चुनाव में हराया था। सुनेत्रा को लगता है कि राकांपा के दोनों धड़ों का विलय हुआ तो केंद्रमें सुप्रिया मंत्री बन जाएंगी। रही शरद पवार की बात तो वे भी दुविधा में फंसे हैं। भतीजे के साथ विलय करने की जगह भतीजे की तरह राजग का हिस्सा बनने का विकल्प भी उनके सामने है। भाजपा को भी लाभ होगा कि लोकसभा में आठ सांसदों का समर्थन बढ़ जाएगा।

प्रतिरोध बिना प्रतिपक्ष

दिल्ली में आम आदमी पार्टी भाजपा सरकार को कोई चुनौती नहीं दे पाई है। रेखा गुप्ता की सरकार के सौ दिन चैन से निकल गए। केजरीवाल सक्रिय होते तो भाजपा सरकार को ऐसी बेफिक्री से काम न करने देते। दरअसल, विधानसभा चुनाव हारने के बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सक्रियता काफी कम हुई है।

कहने को केजरीवाल ने सौरभ भारद्वाज को पार्टी का दिल्ली का मुखिया बना रखा है और पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष। लेकिन ये दोनों पूरी ताकत से विरोध नहीं कर पा रहे। सूत्रों का कहना है कि दोनों को डर है कि ज्यादा मुखरता उनके सियासी भविष्य के लिए खतरा बन सकती है।

केजरीवाल और मनीष सिसोदिया बेशक राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति कर रहे हों पर दोनों की असली जड़ें तो दिल्ली में ही हैं। हालांकि इन दिनों वे दिल्ली की चिंता छोड़ पूरा समय पंजाब को दे रहे हैं। डर है कि पंजाब भी हाथ से निकल गया तो पार्टी बिखर सकती है। पंजाब में विधानसभा की लुधियाना सीट का उपचुनाव जीतना भी उनके लिए इस समय चुनौती है। आतिशी और सौरभ भारद्वाज का डर निकलने के अभी तो कोई आसार लगते नहीं।

(संकलन: मृणाल वल्लरी)




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